मारांग बुरू धोरोमगाढ़ महासम्मेलन में मुख्यमंत्री ने कहा- नशाखोरी और सामाजिक बिखराव से कमजोर हो रहा समाज, युवाओं को अपनी संस्कृति और इतिहास समझने की जरूरत गिरिडीह: मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि आदिवासी समाज को अपनी पहचान, धर्म, संस्कृति और परंपराओं को बचाने के लिए एकजुट होना होगा। समाज के पास अपनी विशिष्ट परंपराएं और अधिकार हैं, जिन्हें भारतीय संविधान में भी मान्यता दी गई है। जरूरत इस बात की है कि आदिवासी समाज इन अधिकारों को समझे और अपनी आने वाली पीढ़ियों तक अपनी सांस्कृतिक विरासत पहुंचाए। उन्होंने कहा कि मारांग बुरू धोरोमगाढ़ की रक्षा और उसका संरक्षण केवल किसी एक व्यक्ति या संगठन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का नैतिक दायित्व है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन गिरिडीह जिले के पीरटांड़ प्रखंड स्थित मधुबन थाना मैदान में आयोजित मारांग बुरू धोरोमगाढ़ महासम्मेलन में शामिल हुए। उन्होंने संताली भाषा में उपस्थित लोगों को संबोधित किया। इस सम्मेलन में झारखंड के विभिन्न जिलों के साथ बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों से आदिवासी समाज के प्रतिनिधि पहुंचे थे। मुख्यमंत्री ने सभी का स्वागत करते हुए समाज को संगठित, शिक्षित और मजबूत बनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को आगे बढ़ाने के लिए केवल सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए समाज के हर व्यक्ति की भागीदारी जरूरी है। आपसी सहयोग और सामूहिक प्रयास से ही समाज का सर्वांगीण विकास संभव है। मुख्यमंत्री ने महासम्मेलन में उठाए गए मुद्दों और आयोजकों की ओर से सौंपे गए ज्ञापन पर न्यायसंगत तरीके से विचार करने का भरोसा भी दिया। आदिवासी समाज की पहचान और अधिकारों को समझना जरूरी मुख्यमंत्री ने कहा कि आदिवासी समाज देश के सबसे पुराने समाजों में शामिल है। इसकी जड़ें मजबूत हैं, लेकिन समय के साथ समाज के लोग अलग-अलग पहचान और विचारों में बंटते चले गए हैं। आज कोई खुद को हिंदू मानता है, तो कोई सरना धर्म का अनुयायी है। कोई जनजातीय भाषा बोलता है, तो कोई हिंदी में बातचीत करता है। ऐसे में समाज को अपनी ऐतिहासिक पहचान और मूल परंपराओं को समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज का जीवन प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ है। जंगल, जमीन, पहाड़ और नदियां केवल संसाधन नहीं, बल्कि समाज की आस्था और जीवन का आधार हैं। हमारे पूर्वज जंगलों में रहते थे और जंगल से ही उन्हें जीवनयापन के साधन मिलते थे। जंगल हमारे लिए भगवान के समान हैं। इसलिए इनकी रक्षा करना और अपनी प्रकृति आधारित जीवनशैली को बचाए रखना जरूरी है। हेमंत सोरेन ने कहा कि संविधान ने आदिवासी समाज को विशेष सामाजिक अधिकार और संरक्षण दिए हैं। देश के कई क्षेत्रों में आदिवासी समाज की सहमति और अनुमति के बिना कोई कार्य नहीं किया जा सकता। समाज के लोगों को इन संवैधानिक प्रावधानों की जानकारी होनी चाहिए, ताकि वे अपने अधिकारों की रक्षा कर सकें। युवा पीढ़ी अपनी परंपरा और रीति-रिवाजों से दूर न हो मुख्यमंत्री ने युवाओं से कहा कि उन्हें अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को जानना चाहिए। उन्होंने अपने पिता दिशोम गुरु शिबू सोरेन और माता रूपी सोरेन को याद करते हुए कहा कि उनके निधन के बाद परिवार ने पारंपरिक विधि-विधान से द्वादशकर्म संपन्न किया। यह हमारी परंपराओं और रीति-रिवाजों का महत्व बताता है। नई पीढ़ी को भी अपनी परंपराओं को समझना और उनका सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज दुनिया विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ चुकी है। इंसान चांद तक पहुंच गया है और लगातार नए शोध हो रहे हैं। लेकिन आदिवासी समाज शिक्षा और आर्थिक स्थिति के मामले में अभी भी पीछे है। समाज को इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा। मुख्यमंत्री ने चिंता जताई कि पहले खेती और पशुपालन आदिवासी समाज के जीवन तथा रोजगार के प्रमुख साधन हुआ करते थे, लेकिन आज की पीढ़ी इनसे दूर होती जा रही है। हमारे पूर्वजों ने जो परंपराएं और जीवनशैली हमें सौंपी थीं, उनमें से कई धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं। समाज को अपनी जड़ों से जुड़कर आगे बढ़ना होगा। दिशोम गुरु के संघर्ष को आगे बढ़ाने की जरूरत हेमंत सोरेन ने कहा कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने झारखंड अलग राज्य के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके संघर्ष से राज्य को अपनी अलग पहचान मिली। झारखंड बने 25 साल से अधिक समय हो चुका है, लेकिन अभी भी विकास के कई लक्ष्य पूरे होने बाकी हैं। अब सभी को मिलकर राज्य और समाज को विकास के रास्ते पर आगे ले जाना होगा। मुख्यमंत्री ने क्षेत्र के दिवंगत विधायक सुदिव्य कुमार सोनू को भी याद किया। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों ने उन्हें विधायक बनाया था और उन्होंने उन्हें मंत्री बनाकर क्षेत्र का मान बढ़ाने का प्रयास किया था। लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। मुख्यमंत्री ने पिछले दो वर्षों में अपने कई करीबी लोगों को खोने का जिक्र करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। मुख्यमंत्री ने आदिवासी समाज में बढ़ती नशाखोरी को गंभीर चिंता का विषय बताया। उन्होंने कहा कि नशे की आदत समाज को कमजोर कर रही है। इससे परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर भी असर पड़ता है। समाज को नशे से बाहर निकालने के लिए सभी को आगे आना होगा। उन्होंने बताया कि सरकार ‘नशामुक्त जीवन हो हमारा’ अभियान के माध्यम से लोगों को जागरूक कर रही है। इसके साथ ही हड़िया और अवैध शराब के निर्माण तथा बिक्री को रोकने के लिए फूलो-झानो आशीर्वाद योजना चलाई जा रही है। इस योजना के तहत हड़िया-दारू बेचने वाली महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका और स्वरोजगार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने लोगों से नशाखोरी छोड़ने और नशामुक्त समाज के निर्माण में सहयोग करने की अपील की। महासम्मेलन में कई राज्यों के प्रतिनिधि हुए शामिल कार्यक्रम में विधायक सोमेश सोरेन, विधायक कल्पना सोरेन, मारांग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष फागू बेसरा, महासचिव हीरालाल मांझी, जिला अध्यक्ष महावीर मुर्मू और सचिव विष्णु किस्कू समेत कई लोग मौजूद थे। झारखंड के अलग-अलग जिलों के अलावा असम, ओडिशा, बिहार, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल से आए आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने भी सम्मेलन में हिस्सा लिया। मुख्यमंत्री के मधुबन पहुंचने पर सीआरपीएफ कैंप परिसर स्थित हेलिपैड पर स्थानीय प्रशासन ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया। आईजी, डीआईजी, उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक ने उनका स्वागत किया। Post navigation पुष्कर महतो का ऐलान- अजीत तिग्गा के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाकर ही लेंगे दम, 15 नवंबर को होगा उलगुलान निशा भगत की मौत से मर्माहत झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा, पुष्कर महतो ने जताया दुख