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खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर झारखंड की राजनीति गरमा गई है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र सरकार पर झारखंड के हितों और अधिकारों को कमजोर करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि झारखंड के खनिज और जमीन पर अधिकारों से जुड़े फैसले दिल्ली से नहीं थोपे जाने चाहिए। संसद ने 13 अगस्त 2026 को खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को दोनों सदनों में पारित कर दिया। रिपोर्टों के अनुसार, विधेयक राज्य सरकारों की खनिज अधिकारों या खनिज वाली जमीन पर टैक्स, सेस और अन्य शुल्क लगाने की शक्तियों को सीमित करने की दिशा में बदलाव करता है। लोकसभा में यह विधेयक 12 अगस्त को पारित हुआ था, जबकि राज्यसभा ने 13 अगस्त को इसे मंजूरी दी।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस विधेयक को झारखंड के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है। उनका कहना है कि झारखंड प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्य है और यहां के खनिजों का इस्तेमाल लंबे समय से देश के औद्योगिक विकास में होता रहा है। ऐसे में खनिज संसाधनों से मिलने वाले राजस्व और उनसे जुड़े अधिकारों पर राज्य की भूमिका कम करना झारखंड के हित में नहीं है। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने लोकसभा और राज्यसभा में विधेयक को जल्दबाजी में पारित कराया। लोकसभा में विधेयक पारित होने के दौरान विपक्षी दलों ने विरोध किया था और चर्चा के तरीके को लेकर भी आपत्ति जताई गई थी। हेमंत सोरेन ने इसे झारखंड और झारखंडियों के साथ अन्याय बताते हुए कहा कि इससे राज्य के विकास और भविष्य पर बड़ा असर पड़ सकता है। उन्होंने विधेयक को कड़ा विरोध जताते हुए ‘काला बिल’ करार दिया है।

हेमंत सोरेन ने यह भी दावा किया है कि खनिज संसाधनों से मिलने वाले राजस्व और राज्य के वित्तीय अधिकारों में कमी का असर झारखंड की सामाजिक कल्याण योजनाओं पर पड़ सकता है। उन्होंने मंईयां सम्मान योजना, अबुआ आवास योजना, पेंशन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि राज्य के सामने इन योजनाओं को चलाने में आर्थिक चुनौती बढ़ सकती है। हेमंत सोरेन ने साफ कहा है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा इस विधेयक का पुरजोर विरोध करेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर केंद्र सरकार विधेयक को वापस नहीं लेती है तो झारखंड में बड़ा आंदोलन किया जाएगा। उनके मुताबिक आंदोलन को जिले से लेकर प्रखंड, पंचायत और शहर तक ले जाया जाएगा। उन्होंने कहा कि झारखंड अपने हक और अधिकार के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ने से पीछे नहीं हटेगा। इतना स्पष्ट है कि खनिज अधिकारों को लेकर केंद्र और झारखंड सरकार के बीच राजनीतिक टकराव तेज होने के संकेत मिल रहे हैं। संसद से विधेयक पारित होने के बाद अब यह मुद्दा झारखंड की राजनीति में आने वाले दिनों में बड़ा आंदोलनात्मक रूप ले सकता है।

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