लक्ष्मीनारायण मुंडा किसी भी सभ्य समाज में एक इंसान का हत्या करना,चाहे वह अपराधी ही क्यों न हो,अपराध है। कानून का राज तभी सार्थक होता है जब संदिग्ध को गिरफ्तार कर निष्पक्ष जांच के बाद सजा दी जाए। हाल में भरत भूषण तिवारी की बिहार पुलिस द्वारा कथित फेक एनकाउंटर की घटना ने देश में सवालों का तूफान खड़ा कर दिया है। लोग सोशल मीडिया पर,सड़कों पर और मीडिया में इसकी निंदा कर रहे हैं। यह आक्रोश जायज है। राज्य मशीनरी, पुलिस और सरकार इस मामले में घिरी हुई है। लेकिन इस आक्रोश की सच्चाई तब उजागर होती है जब हम इसकी तुलना उन हजारों मामलों से करते हैं जो आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में रोजाना हो रहे हैं। नक्सल प्रभावित इलाकों में एनकाउंटर, उठ रहे गंभीर सवाल छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा, महाराष्ट्र और आंध्र के नक्सल प्रभावित इलाकों में पुलिस, अर्धसैनिक बलों और राज्य प्रायोजित मिलिशिया द्वारा फेक एनकाउंटरों का सिलसिला दशकों से चल रहा है। इसके आंकड़े डरावनी हैं। मानवाधिकार संगठनों और फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले दो दशकों में हजारों युवा आदिवासी, दलित और स्थानीय निवासी “मुठभेड़” के नाम पर मार दिए गए। ज्यादातर मामलों में कोई ठोस सबूत नही होता है। बस पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में “क्रॉस फायर” लिख दिया जाता है। इन युवाओं पर “नक्सली” या “माओवादी” का ठप्पा लगाकर उन्हें मार डाला जाता है। इसका असली कारण राज्य और कॉर्पोरेट घरानों के बीच साठगांठ हैं। खनिज समृद्ध क्षेत्रों में जमीन हथियाने,वनों की लूट और औद्योगिक प्रोजेक्ट्स के लिए रास्ता साफ करने की यह व्यवस्थित रणनीति है। सुरक्षा बलों को “ऑपरेशन” का नाम देकर पूर्ण छूट दे दी जाती है। कोई जवाबदेही नही। कोई न्यायिक जांच नही होता है। मीडिया भी चुप रहता है। “प्रबुद्ध” वर्ग, जिन्हें शहरों में एक एनकाउंटर पर रातोंरात “मानवाधिकार” का ज्ञान हो जाता है, इन आदिवासी मौतों पर चुप्पी साध लेते हैं। आखिर क्यों ? क्योंकि शिकार “उनका” नही, “हमारा” नही है। वे आदिवासी हैं, दलित हैं, अल्पसंख्यक हैं। उनके लिए “सबूत” की जरूरत नही पड़ती है। “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “विकास” के नाम पर उनकी मौतें “आवश्यक बलिदान” मान ली जाती हैं। क्या आदिवासी युवाओं की जान कम कीमती है? यह पक्षपात न्याय व्यवस्था की जड़ों को खोखला कर रहा है। जब संपन्न वर्ग और सवर्ण समुदाय के साथ ऐसी घटना घटती है या बड़े शहरों में कोई एनकाउंटर होता है तो टीवी शो में डिबेट्स छिड़ जाती हैं,विपक्ष सरकार को घेरता है,मानवाधिकार आयोग सक्रिय हो जाता है। लेकिन छत्तीसगढ़,झारखंड,आंध्र प्रदेश में सैकड़ों युवा मारे जाएं तो सब “मौन” रहते हैं। क्या आदिवासी युवा का खून कम मूल्यवान है? क्या उनकी जान की कीमत शहर के मध्यम वर्ग से कम है? यह सवाल देश की आत्मा को चीरता है। इसका कारण बहुत गहरा है। मुख्यधारा का मीडिया कॉर्पोरेट नियंत्रण में है। राजनेता खनिज पट्टों और चुनावी चंदे के लालच में फंसे हैं। प्रबुद्ध वर्ग अक्सर आदिवासी क्षेत्रों की समस्या मानकर इससे शहरी-उपनिवेशी नजरिए से देखता है। इसका नतीजा होता है? व्यवस्थागत हिंसा को वैधता मिल जाती है। जो लोग “फेक एनकाउंटर” पर भरत भूषण तिवारी मामले में चीखते हैं,वही छत्तीसगढ़ झारखंड आंध्र प्रदेश में “ऑपरेशन” की तारीफ करते हैं। यह दोहरा मापदंड न सिर्फ नस्लवाद और वर्गवाद को बढ़ावा देता है, बल्कि लोकतंत्र को भी कमजोर करता है। आज समाज को समझना होगा कि जब राज्य खुद हत्यारा बन जाता है तो वह कानून का दुश्मन बन जाता है। चाहे शिकार कोई भी हो—भरत भूषण हो या बस्तर का आदिवासी युवा हो —हत्या हत्या है। मीडिया, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक दलों को इस चुप्पी को तोड़ना चाहिए। स्वतंत्र जांच,सीबीआई जांच,पीड़ित परिवारों को मुआवजा और दोषी अधिकारियों पर सजा अनिवार्य होनी चाहिए। अंत में सभ्यता का पैमाना यही है कि हम सबसे कमजोर के लिए भी आवाज उठाएं। अगर हम चुप रहे तो आज आदिवासी कल हमारा नंबर आएगा। राज्य की अंधी हिंसा और समाज के चुप्पी भरे आक्रोश को चुनौती देना ही सच्चा न्याय होगा। (लेखक आदिवासी एक्टिविस्ट और चिन्तक हैं। जल्द ही एक पुस्तक प्रकाशित होने वाली है ।) नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। NEWS-NET का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं। Post navigation लखनऊ के अलीगंज में भीषण आग – कोचिंग सेंटर समेत इमारत में 14 की मौत, कई घायल