खान और खनिज से जुड़े संशोधन को लेकर झारखंड में सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा है कि भाजपा को यह स्पष्ट करना चाहिए कि झारखंड की खनिज संपदा और उससे जुड़े राजस्व के मामलों में दिल्ली की भूमिका क्यों बढ़ाई जा रही है। विनोद पांडेय ने प्रेस बयान जारी कर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू के बयान पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि भाजपा के पास झारखंड के संवैधानिक अधिकारों, खनिज संपदा और राज्य के राजस्व से जुड़े सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं है। उनके मुताबिक, भाजपा को मुद्दे से भटकने के बजाय यह बताना चाहिए कि केंद्र सरकार के प्रस्तावित बदलाव से राज्यों के अधिकारों पर क्या असर पड़ेगा।विनोद पांडेय का मुख्य सवाल खनिज वाली जमीन पर राज्य सरकार द्वारा लगाए जाने वाले कर, सेस और लेवी को लेकर है। उनका कहना है कि अगर केंद्र सरकार के प्रस्ताव से राज्यों के अधिकार प्रभावित नहीं होते हैं, तो फिर राज्य सरकारों को खनिज-अधिकारों और खनिजयुक्त जमीन पर कर या सेस लगाने के लिए केंद्र द्वारा तय शर्तों के अधीन करने की जरूरत क्यों पड़ी? उन्होंने कहा कि झारखंड अपने प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के अधिकार की बात कर रहा है। उनके अनुसार, खनिज झारखंड की जमीन से निकलता है और खनन का सीधा असर भी राज्य के लोगों, पर्यावरण और स्थानीय इलाकों पर पड़ता है। इसलिए इससे होने वाले राजस्व के इस्तेमाल में राज्य की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला झामुमो महासचिव ने जुलाई 2024 के सुप्रीम कोर्ट के नौ सदस्यीय संविधान पीठ के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अदालत ने स्पष्ट किया था कि खनिजयुक्त भूमि भी भूमि है और संविधान के तहत राज्य सरकारों को ऐसी जमीन पर कर लगाने का अधिकार है। इसी अधिकार के आधार पर झारखंड विधानसभा ने कानून बनाया और JMBL Cess लागू किया गया। सवाल है कि जब सुप्रीम कोर्ट राज्यों के अधिकार को मान्यता दे चुका है, तो संसद के कानून के जरिए उस अधिकार को व्यवहार में सीमित करने की कोशिश क्यों की जा रही है। झामुमो नेता ने कहा कि खनन का असर सिर्फ सरकारी खजाने तक सीमित नहीं रहता। खनन के कारण कई इलाकों में लोगों का विस्थापन होता है। जंगल और पर्यावरण पर दबाव पड़ता है। पानी और हवा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। गांवों की सड़क, बिजली, पानी और दूसरी सुविधाओं पर भी अतिरिक्त दबाव आता है। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए राज्य सरकार को अतिरिक्त संसाधन जुटाने का अधिकार मिलना जरूरी है, ताकि खनन प्रभावित क्षेत्रों में विकास और लोगों की जरूरतों पर खर्च किया जा सके। खनिज लूट के आरोप पर भाजपा से प्रमाण मांगा, मंईयां सम्मान योजना का भी किया जिक्र विनोद पांडेय ने भाजपा द्वारा खनिज नीति और कथित ‘खनिज लूट’ को लेकर लगाए जा रहे आरोपों पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अगर भाजपा के पास किसी तरह की गड़बड़ी के प्रमाण हैं तो उन्हें जांच एजेंसियों और कानून के सामने पेश किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि केवल प्रेस बयान जारी कर आरोप लगाना राजनीति हो सकती है, लेकिन इसे प्रमाण नहीं माना जा सकता। उन्होंने खनिज ब्लॉकों की नीलामी को लेकर भाजपा द्वारा उठाए जा रहे सवालों पर भी कहा कि खनन क्षेत्र की पूरी व्यवस्था में केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका होती है। इसलिए केवल नीलामी के आंकड़े पेश करके झारखंड की खनिज नीति पर सवाल उठाना पर्याप्त नहीं है। मंईयां सम्मान योजना को लेकर भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि राज्य सरकार के पास पर्याप्त संसाधन होंगे तो महिलाओं, किसानों, गरीबों, युवाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास से जुड़ी योजनाओं को मजबूत किया जा सकेगा। विनोद पांडेय ने भाजपा के इस तर्क पर भी प्रतिक्रिया दी कि केंद्र से टकराव राज्य के हित में नहीं है। उन्होंने कहा कि झारखंड अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए आवाज उठाता है तो इसे केंद्र से टकराव नहीं, बल्कि संघीय व्यवस्था की रक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए। विनोद पांडेय ने कहा कि झारखंड की खनिज संपदा सिर्फ कंपनियों के कारोबार या बैलेंस शीट का हिस्सा नहीं है। यह उन आदिवासी, मूलवासी, मजदूर और स्थानीय परिवारों की जमीन से जुड़ी है, जिन्होंने खनन और विकास की कीमत लंबे समय से चुकाई है। उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार ऐसा कानून लाती है जिससे राज्यों के संवैधानिक अधिकार सीमित होने की आशंका है, तो झारखंड सवाल करेगा। अगर राज्य के राजस्व पर असर पड़ने की आशंका है, तो झारखंड सवाल करेगा। अगर खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए राज्य की वित्तीय क्षमता कमजोर होती है, तो भी झारखंड आवाज उठाएगा। Post navigation धनबाद में कोयला कारोबारी को घर में लगी गोली, हालत नाजुक; पुलिस जांच में जुटी