अभिषेक सिंह मां के लिए उसकी औलाद ही सबसे बड़ी पूंजी होती है, तो एक बेटे के लिए मां का आंचल पूरी दुनिया। पद, प्रतिष्ठा और जिम्मेदारियां चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, मां के बिछड़ने का दर्द हर इंसान को भीतर तक तोड़ देता है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की आंखों में छलकता दर्द भी यही कहानी कह रहा है। मां की ममता और उसके आंचल की छांव का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। मां चाहे किसी संपन्न परिवार की हो या गरीबी में जीवन गुजार रही हो, उसके लिए उसकी संतान ही दुनिया की सबसे बड़ी दौलत होती है। उसी तरह, संतान की उम्र चाहे बचपन की हो, जवानी की या अधेड़ अवस्था की, मां के लिए वह हमेशा उसका बच्चा ही रहता है। उम्र बढ़ जाती है, कंधों पर जिम्मेदारियां आ जाती हैं, दुनिया के सामने पहचान बड़ी हो जाती है, लेकिन मां के सामने संतान का रिश्ता कभी नहीं बदलता। मां के जाने के बाद यही रिश्ता सबसे ज्यादा याद आता है और उसकी कमी जीवन के हर मोड़ पर महसूस होती है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के चेहरे पर इन दिनों दिखाई देने वाली उदासी और उनकी मां स्वर्गीय रूपी सोरेन की याद में सामने आ रहे भावुक क्षण इसी रिश्ते की गहराई को बयां करते हैं। 07 अक्टूबर 2026 का वह काला दिन जब रूपी सोरेन के निधन की खबर दुनिया के सामने आई। एक तरफ राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन हैं, जिनके कंधों पर पूरे झारखंड की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ वही हेमंत हैं, जो अपनी मां को खो देने वाले एक बेटे। मां के सामने हर बेटा बच्चा ही रहता है हेमंत सोरेन को राज्य के प्रशासनिक कामकाज के बीच देखना और फिर अपनी मां की याद में भावुक होते देखना, दो अलग-अलग पहलु हैं। सार्वजनिक जीवन में उन्हें फैसले लेने होते हैं, अधिकारियों से बात करनी होती है और राज्य के लोगों की समस्याओं पर ध्यान देना होता है। लेकिन परिवार के भीतर वह भी एक बेटे हैं, जिन्होंने अपनी मां को खोया है। मां जीवन की पहली शिक्षक होती है, मुश्किल समय में हौसला देने वाली साथी होती है और ऐसी छांव होती है, जहां इंसान दुनिया की तमाम परेशानियों के बाद लौटकर सुकून महसूस करता है। जब यही छांव सिर से उठ जाती है, तो आसपास लोगों की भीड़ होने के बावजूद एक खालीपन महसूस होता है। मां की आवाज, उसका स्नेह, उसकी चिंता और छोटी-छोटी बातों में छिपा उसका प्यार यादों में बस जाते हैं। यही यादें कभी आंखों को नम कर देती हैं, तो कभी इंसान को आगे बढ़ने की ताकत देती हैं। हेमंत सोरेन के लिए भी यह समय केवल पारिवारिक शोक का नहीं, बल्कि अपनी मां से जुड़ी यादों को फिर से जीने का है। मां के साथ बिताए पल, उनका स्नेह और परिवार के संघर्षों में उनकी भूमिका अब यादों का हिस्सा हैं। सार्वजनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी ऐसी यादों से अलग होना आसान नहीं होता, और ये वही समझ सकता है जिसके ऊपर से मां का साया उठ चुका होता है। 14 महीने – माता-पिता दोनों का साया उठना एक अपूरणीय क्षति किसी परिवार के लिए माता-पिता का साथ जीवन की सबसे बड़ी ताकतों में से एक होता है। वे केवल परिवार के सदस्य नहीं होते, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाली कड़ी भी होते हैं। ऐसे में जब कम समय के भीतर माता-पिता दोनों का साथ छूट जाए, तो उस खालीपन को शब्दों में व्यक्त करना कठिन हो जाता है। हेमंत सोरेन और उनके परिवार के लिए माता-पिता का बिछड़ना ऐसी ही एक बड़ी क्षति है। पिता शिबू सोरेन के संघर्षों और झारखंड आंदोलन से जुड़ी स्मृतियों के बीच रूपी सोरेन की भूमिका भी परिवार के जीवन का अहम हिस्सा रही। परिवार के संघर्षों में साथ निभाना, कठिन परिस्थितियों में घर को संभालना और अपने लोगों के लिए खड़े रहना अक्सर ऐसे काम होते हैं, जिनकी चर्चा सार्वजनिक मंचों पर नहीं होती है। लेकिन परिवार के भीतर इनका महत्व बहुत बड़ा होता है। किसी आंदोलन या सार्वजनिक जीवन की कहानी में अक्सर उन लोगों के नाम प्रमुखता से सामने आते हैं, जो मंच पर दिखाई देते हैं, भाषण देते हैं या नेतृत्व करते हैं। मगर उनके साथ चलने वाले परिवार के सदस्यों का योगदान कई बार पर्दे के पीछे रह जाता है। रूपी सोरेन का जीवन भी इसी दृष्टि से याद किया जाएगा कि उन्होंने परिवार के संघर्षों और मुश्किल दौर में अपना साथ बनाए रखा। गांव की मिट्टी, खेत-खलिहान और पुरानी यादों तलाशते मां का स्नेह गांव का घर, आंगन, खेत-खलिहान और आसपास का माहौल किसी भी इंसान के जीवन में केवल जगह नहीं होते। उनसे बचपन की यादें, परिवार के साथ बिताए पल और अपनों के स्नेह की अनगिनत कहानियां जुड़ी होती हैं। मां के जाने के बाद यही जगहें उसकी मौजूदगी का एहसास कराती हैं। आंगन का कोई कोना, घर का कोई कमरा या खेतों की ओर जाने वाला रास्ता अचानक पुरानी यादों को सामने ला देता है। हेमंत सोरेन के लिए भी परिवार और गांव से जुड़ी स्मृतियां मां की यादों से अलग नहीं होंगी। मां की याद केवल तस्वीरों तक सीमित नहीं रहती; वह उन स्थानों, परंपराओं और अनुभवों में भी बसती है, जिनसे किसी व्यक्ति का जीवन बना होता है। झारखंड आंदोलन की कहानी में शिबू सोरेन का संघर्ष एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। इस संघर्ष के दौरान परिवार ने भी कई उतार-चढ़ाव देखे। आंदोलन के कठिन दिनों में परिवार का साथ, धैर्य और त्याग भी उस यात्रा का हिस्सा रहे। रूपी सोरेन का योगदान भले ही राजनीतिक मंचों पर उतना दिखाई नहीं दिया हो, लेकिन परिवार के संघर्षों के संदर्भ में उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसी आंदोलन के पीछे केवल नेतृत्व करने वाले लोग ही नहीं होते, बल्कि उनके साथ खड़े रहने वाले परिवार भी होते हैं, जो कई बार बिना किसी सार्वजनिक पहचान के कठिनाइयों का सामना करते हैं। रस्में पूरी होंगी, लोग लौट जाएंगे, लेकिन मां की कमी हर पल महसूस होगी हमारे समाज में निधन के बाद होने वाले संस्कार केवल धार्मिक परंपराएं नहीं होते। वे परिवार को दुख साझा करने, दिवंगत व्यक्ति को याद करने और उसके जीवन के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर भी देते हैं। रूपी सोरेन के निधन के बाद परिवार इन परंपराओं का निर्वहन कर रहा है। दसकर्म और इसके बाद होने वाले भोज जैसे आयोजनों में रिश्तेदार पहुचेंगे, परिचित सांत्वना देंगे और व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी भी निभाई जायेंगी, लेकिन परिवार के भीतर अपने प्रियजन की कमी लगातार बनी रहेंगी। रस्में पूरी हो जाती हैं, लोग लौटने लगते हैं और जीवन धीरे-धीरे अपनी सामान्य गति की ओर बढ़ने लगता है। मगर जिस व्यक्ति को खोया गया है, उसकी कमी जीवन में बार-बार महसूस होती है। हेमंत सोरेन के परिवार के लिए भी यह समय अपनी मां की स्मृतियों को संजोने और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने का है। इन दिनों परिवार की तस्वीरों में परंपराओं, सादगी और आपसी साथ की झलक दिखाई देती है। विधायक और हेमंत सोरेन की जीवनसंगिनी कल्पना सोरेन भी परिवार के साथ खड़ी नजर आती हैं। ऐसे कठिन समय में परिवार के सदस्यों का एक-दूसरे का सहारा बनना बहुत मायने रखता है। मां को खोने का गम, फिर भी नहीं थमे कदम किसी भी परिवार में शोक का समय आने पर व्यक्ति चाहता है कि वह अपने प्रियजन की यादों के साथ कुछ समय बिता सके। लेकिन सार्वजनिक जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति के सामने कई बार ऐसी परिस्थितियां होती हैं, जब निजी दुख के बीच भी अपने काम को आगे बढ़ाना पड़ता है। हेमंत सोरेन के सामने भी यही चुनौती है। एक ओर मां को खोने का गहरा दुख है, तो दूसरी ओर झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में राज्य के लोगों के प्रति उनकी जिम्मेदारी है। राज्य का प्रशासनिक कामकाज भी लगातार और सामानांतर चल रहा है। लोगों की समस्याएं, सरकारी योजनाएं, अधिकारियों के साथ बैठकें और जरूरी फैसले किसी एक व्यक्ति के निजी जीवन की परिस्थितियों के कारण पूरी तरह रुक नहीं सकते। ऐसे में मुख्यमंत्री का अपने पारिवारिक दुख के बीच भी अधिकारियों से संवाद करना, स्थानीय लोगों से मिलना और जनसमस्याओं को सुनना उनकी सार्वजनिक भूमिका का हिस्सा है। मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी उन्हें राज्य के कामकाज से जोड़े रखी है, जबकि एक बेटे का रिश्ता उन्हें मां की यादों से जोड़ रहा है। रूपी सोरेन की याद परिवार के साथ झारखंड आंदोलन के इतिहास से भी जुड़ी रहेगी रूपी सोरेन को याद करना केवल एक मां को याद करना नहीं, बल्कि उस परिवार की यात्रा को भी याद करना है, जिसने झारखंड आंदोलन के लंबे दौर में कई चुनौतियों का सामना किया। शिबू सोरेन का राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष झारखंड के इतिहास से जुड़ा रहा है। ऐसे संघर्षों के पीछे परिवार का साथ भी एक महत्वपूर्ण पक्ष होता है। परिवार के सदस्य कई बार उन परिस्थितियों का सामना करते हैं, जिनकी चर्चा सार्वजनिक जीवन में कम होती है। एक आंदोलन का इतिहास केवल रैलियों, भाषणों, गिरफ्तारियों, राजनीतिक फैसलों और उपलब्धियों से नहीं बनता। उसमें उन परिवारों की कहानियां भी शामिल होती हैं, जिन्होंने संघर्ष के दिनों में साथ दिया, कठिन परिस्थितियों को सहा और निजी जीवन में अनेक समझौते किए। रूपी सोरेन की स्मृति इस त्याग और बलिदान की गवाह है। उनका योगदान किस रूप में और कितना रहा, इसका आकलन इतिहास और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। लेकिन इतना जरूर है कि झारखंड आंदोलन से जुड़े परिवारों की कहानी में घर और परिवार की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसी संघर्ष के साथ खड़े रहने का अर्थ केवल सार्वजनिक मंच पर मौजूद रहना नहीं होता, कभी-कभी परिवार को संभालना, मुश्किल दिनों में साथ देना और अपनों का हौसला बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। मां की याद कभी खत्म नहीं होती, वह जीवन का हिस्सा बन जाती है मां की याद खत्म नहीं होती। वह कभी किसी पुराने संबोधन में सुनाई देती है, कभी किसी पारिवारिक परंपरा में दिखाई देती है और कभी किसी ऐसे क्षण में आंखें नम कर देती है, जब इंसान को लगता है कि काश मां आज उसके पास होती। हेमंत सोरेन के लिए भी मां की यादें जीवन भर साथ रहेंगी। मुख्यमंत्री के रूप में उनके सामने आने वाली चुनौतियां अपनी जगह रहेंगी, लेकिन उन चुनौतियों के बीच मां का स्नेह, उनके साथ बिताए पल और परिवार के संघर्षों की स्मृतियां भी उनके जीवन का हिस्सा बनी रहेंगी। एक बेटे के लिए मां का जाना केवल परिवार के एक सदस्य का बिछड़ना नहीं होता। उसके साथ बचपन की एक दुनिया, जीवन का एक सुरक्षित ठिकाना और बिना शर्त प्यार करने वाला रिश्ता भी यादों में सिमट जाता है। यही कारण है कि दुनिया की नजर में बड़ा पद हासिल कर लेने के बाद भी मां के सामने इंसान हमेशा बच्चा ही रहता है। रूपी सोरेन अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें उनके परिवार के जीवन, संस्कारों और संघर्षों से जुड़ी रहेंगी। गांव की मिट्टी से लेकर परिवार के आंगन तक और शिबू सोरेन के संघर्षों से लेकर हेमंत सोरेन की जिम्मेदारियों तक, उनकी स्मृति अनेक रूपों में महसूस की जाती रहेगी। 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