झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा और अखिल भारतीय किसान सभा, झारखंड के एक प्रतिनिधिमंडल ने लोक भवन में महामहिम राज्यपाल से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को 34 सूत्री मांगपत्र सौंपते हुए झारखंड आंदोलनकारियों, किसानों, मजदूरों, विस्थापितों और विद्यार्थियों को न्याय, सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीवन जीने का अधिकार सुनिश्चित करने की मांग की। प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि झारखंड आंदोलनकारियों को राजकीय सम्मान और अलग पहचान दी जाए। उनके पुत्र-पुत्रियों एवं आश्रितों को रोजगार और नियोजन में सीधी नियुक्ति की व्यवस्था की जाए तथा जेल जाने की बाध्यता समाप्त की जाए। इसके साथ ही सभी आंदोलनकारियों को प्रति माह 50-50 हजार रुपये सम्मान पेंशन, समूह बीमा, नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा और सरकार द्वारा पूर्व में किए गए सभी वादों एवं आश्वासनों को जल्द से जल्द लागू करने की मांग की गई। प्रतिनिधिमंडल का कहना था कि अलग झारखंड राज्य के निर्माण के जिन मूल्यों, आदर्शों और संघर्षों के आधार पर राज्य अस्तित्व में आया, उसी भावना के अनुरूप इन मांगों पर सरकार को गंभीरता से निर्णय लेना चाहिए। राज्यपाल से मिलने वाले प्रतिनिधिमंडल में झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा एवं अखिल भारतीय किसान सभा, झारखंड के प्रधान सचिव पुष्कर महतो, दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के प्रभारी अंथन लकड़ा, केंद्रीय सचिव पुनीत उरांव, केंद्रीय कोषाध्यक्ष सरोजिनी कच्छप, जिला अध्यक्ष सुबोध कुमार लकड़ा तथा जिला सचिव अमर भेंगरा सहित अन्य पदाधिकारी शामिल थे। सरकार ने वादे किए, लेकिन निभाए नहीं – पुष्कर महतो झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा के प्रधान सचिव पुष्कर महतो ने कहा कि जिस उद्देश्य और मूल्यों को लेकर अलग झारखंड राज्य का गठन हुआ था, आज उन्हीं मूल्यों की अनदेखी की जा रही है। उनका आरोप है कि विकास के नाम पर झारखंड आंदोलन की मूल भावना और मर्यादाओं को पीछे छोड़ दिया गया है। उन्होंने कहा कि अलग राज्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले आंदोलनकारी आज सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। कई आंदोलनकारियों की स्थिति इतनी खराब है कि उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। सबसे दुखद बात यह है कि कई आंदोलनकारी बिना किसी राजकीय सम्मान के दुनिया छोड़ रहे हैं, जबकि राज्य निर्माण में उनका ऐतिहासिक योगदान रहा है। पुष्कर महतो ने कहा कि 30 सितंबर 2024 को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झारखंड आंदोलनकारियों की मांगों पर सकारात्मक पहल का भरोसा दिया था। इसके बाद 10 मार्च 2026 को विधानसभा स्थित मुख्यमंत्री कक्ष में वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर, मंत्री सुदिव्य सोनू और मंत्री योगेंद्र प्रसाद महतो के साथ हुई बैठक में आंदोलनकारियों को कई आश्वासन दिए गए। उन्होंने बताया कि बैठक में आंदोलनकारियों के सम्मान पेंशन के लिए 100 करोड़ रुपये के प्रावधान, सीधी नियुक्ति के बजाय सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देने सहित कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई थीं। लेकिन उनका आरोप है कि इन आश्वासनों को अब तक धरातल पर नहीं उतारा गया, जिससे आंदोलनकारियों में निराशा है। उन्होंने आगे कहा कि 10 जून 2026 को मुख्यमंत्री आवास घेराव कार्यक्रम के दौरान वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने मुख्यमंत्री के निर्देश पर सार्वजनिक रूप से भरोसा दिया था कि झारखंड आंदोलनकारियों को जीते-जी राजकीय सम्मान दिया जाएगा। इसके अलावा उन्हें अलग पहचान, उनके पुत्र-पुत्रियों और आश्रितों को रोजगार में प्राथमिकता, जेल जाने की अनिवार्यता समाप्त करने, सम्मान पेंशन, नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा, समूह बीमा और यात्रा कूपन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात कही गई थी। लेकिन अब तक इन घोषणाओं पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2012 और 2021 के सरकारी संकल्पों का भी आज तक पूरी तरह पालन नहीं किया गया, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। पुष्कर महतो ने कहा कि संविधान के प्रावधानों के अनुरूप बने झारखंड लोक सेवा आयोग और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग में भी झारखंड आंदोलनकारियों के परिवारों को अपेक्षित अधिकार नहीं मिल रहे हैं। उनका कहना है कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में आंदोलनकारियों के पुत्र-पुत्रियों और आश्रितों को प्राथमिकता या सीधी नियुक्ति की व्यवस्था लागू नहीं की गई। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के समता जजमेंट के अनुरूप राज्य को खनिज संपदा पर 26 प्रतिशत रॉयल्टी का अधिकार नहीं मिल रहा है और पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों का भी पूरी तरह पालन नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा की चिंता केवल आंदोलनकारियों तक सीमित नहीं है। संगठन चाहता है कि राज्य के किसानों, मजदूरों, छात्रों, युवाओं, महिलाओं, विस्थापितों और आम झारखंडी समाज के हितों की रक्षा हो तथा अलग राज्य आंदोलन के मूल उद्देश्यों के अनुरूप झारखंड का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित किया जाए। पुष्कर महतो ने मांग की कि सभी झारखंड आंदोलनकारियों को राजकीय सम्मान, स्वतंत्र पहचान, उनके परिवारों को रोजगार की गारंटी, जेल जाने की बाध्यता समाप्त करने तथा प्रत्येक आंदोलनकारी को 50-50 हजार रुपये सम्मान पेंशन देने का निर्णय जल्द लिया जाए। उन्होंने कहा कि यह केवल आर्थिक सहायता का विषय नहीं, बल्कि राज्य निर्माण में योगदान देने वाले आंदोलनकारियों के सम्मान और स्वाभिमान का सवाल है। उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता और दिशोम गुरु शिबू सोरेन को अब तक गजट अधिसूचना जारी कर झारखंड आंदोलनकारी का सर्वोच्च सम्मान नहीं दिया गया है। इसे उन्होंने चिंता का विषय बताते हुए सरकार से जल्द इस संबंध में निर्णय लेने की मांग की। पुष्कर महतो ने कहा कि आज भी कई वास्तविक झारखंड आंदोलनकारी सरकारी सूची से बाहर हैं। ऐसे लोगों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए झारखंड आंदोलनकारी चिह्नितीकरण आयोग का पुनर्गठन किया जाना चाहिए, ताकि कोई भी वास्तविक आंदोलनकारी सरकारी सम्मान और सुविधाओं से वंचित न रहे। उन्होंने झारखंडी भाषा, संस्कृति, माय-माटी और अलग राज्य आंदोलन के मूल्यों की रक्षा पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और विरासत को सुरक्षित रखने के लिए सरकार को ठोस और प्रभावी कदम उठाने चाहिए। अंत में उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में संविधान की धारा 3(ए) की भावना और अन्य संवैधानिक मूल्यों का पूरी तरह पालन नहीं हो रहा है। उन्होंने सरकार से मांग की कि संविधान की भावना के अनुरूप कार्य करते हुए झारखंड आंदोलनकारियों, स्थानीय लोगों और राज्य के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए। जाति-आय प्रमाण पत्र से लेकर 26% रॉयल्टी तक, अंथन लकड़ा के कई अहम सवाल दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के प्रभारी अंथन लकड़ा ने कहा कि राज्य में आम लोगों, खासकर झारखंडी परिवारों को जाति, आय और आवासीय प्रमाण पत्र बनवाने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना रिश्वत दिए प्रमाण पत्र बनवाना मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। साथ ही उन्होंने राजनीतिक दलों पर भी निशाना साधते हुए कहा कि चुनाव के समय वोट मांगने वाले दल इस गंभीर मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं।अंथन लकड़ा ने कहा कि राज्य में सीएनटी-एसपीटी एक्ट और पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों का सही ढंग से पालन नहीं हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि झारखंड की मूल पहचान और जनसांख्यिकीय स्वरूप को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि चुटिया, कटहल टोली, डेला टोली, अंबा टोली, बसर टोली, लोहरा कोचा, चडरी, सिरम टोली, ढुमसा टोली जैसे पारंपरिक गांवों और देवी मंडप, बुढ़वा महादेव, अखड़ा, मसना, जाहेर स्थान तथा पहनाई जमीन जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों को खत्म करने की कोशिश चिंता का विषय है। उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड अलग राज्य आंदोलन का विरोध करने वाले लोगों की प्रतिमाएं और चित्र स्थापित किए जा रहे हैं, जो आंदोलनकारियों की भावनाओं के विपरीत है। अंथन लकड़ा ने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट के समता फैसले के अनुसार राज्य को खनिज संपदा पर 26 प्रतिशत रॉयल्टी का अधिकार मिलना चाहिए। उनका कहना था कि इस अधिकार से जुड़े हजारों करोड़ रुपये का लाभ अब तक राज्य को नहीं मिल सका है। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि झारखंड की मूल आबादी लगातार घट रही है और बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में पलायन करने को मजबूर हैं। उनके अनुसार, यदि समय रहते इन मुद्दों पर गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो राज्य की पहचान, संस्कृति और स्थानीय लोगों के अधिकारों पर और अधिक संकट गहरा सकता है। गरीबों की बढ़ती मुश्किलों और न्याय में देरी पर पुनीत उरांव ने जताई चिंता केंद्रीय सचिव पुनीत उरांव ने कहा कि मूल्य वृद्धि चीजों पर हम गरीब झारखंडियो के लिए चिंतनीय हैं. मातृशक्ति का वेश्यावृत्ति के धंधे में आना, जन विरोधी पूंजीवाद का बढ़ते जाना चिंतनीय बात हैं. मजदूरों,किसानों, छात्रों – युवाओं का पलायन दु:खद है. अदालत में लाखों लाख केस लंबित होना तथा न्याय की प्रत्याशा में दिवंगत हो जाना अति संवेदनशील विषय है. ऑनलाइन जमीन रिकॉर्ड में छेड़छाड़ से झारखंडियों की पहचान पर खतरा : सरोजिनी कच्छप झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा की केंद्रीय कोषाध्यक्ष सरोजिनी कच्छप ने कहा कि ऑनलाइन रसीद के नाम पर जमीन के रिकॉर्ड में कथित छेड़छाड़ की जा रही है, जिससे झारखंडियों की पहचान, अस्मिता और अस्तित्व पर खतरा पैदा हो रहा है। उन्होंने कहा कि यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। साथ ही उन्होंने झारखंडी भाषाओं के धीरे-धीरे विलुप्त होने, शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति के बढ़ते बाजारीकरण तथा जल, जंगल और जमीन पर बढ़ते दबाव को भी गंभीर चिंता का विषय बताया। सरोजिनी कच्छप ने कहा कि झारखंडियों की पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा किए गए वादों और जारी संकल्पों पर अब तक पूरी तरह अमल नहीं हुआ है, जिससे लोगों में निराशा है। उन्होंने कहा कि झारखंड का विकास खनिज आधारित उद्योगों की स्थापना के जरिए होना चाहिए, ताकि राज्य के लाखों युवाओं को रोजगार और स्वरोजगार के अवसर मिल सकें। इसके साथ ही कृषि को उद्योग का दर्जा देने और हर खेत तक सिंचाई की सुविधा पहुंचाने की दिशा में प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। उन्होंने मांग की कि केरल की तर्ज पर झारखंड में भी कक्षा 1 से 6 तक बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था की जाए। उन्होंने कहा कि कुड़ुख, मुंडारी, हो, संथाली, खड़िया, नागपुरी, खोरठा, कुरमाली और पंचपरगनिया जैसी झारखंडी भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए विशेष नीति बनाई जानी चाहिए। उनका कहना था कि स्थानीय भाषाओं की उपेक्षा और बाहरी भाषाओं का बढ़ता प्रभाव राज्य की सांस्कृतिक पहचान के लिए खतरा बनता जा रहा है। सरोजिनी कच्छप ने यह भी कहा कि बीएसएल, एचईसी, सीसीएल, बीसीसीएल, ईसीएल, चांडिल डैम, मसानजोर डैम, पीटीपीएस, एनटीपीएस, रेलवे परियोजनाओं, हाई टेंशन इंसुलेटर फैक्ट्री और अन्य विकास परियोजनाओं से विस्थापित हुए लोगों को आज भी उचित मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार नहीं मिल पाया है। उन्होंने मांग की कि सभी विस्थापित परिवारों को न्याय दिलाया जाए। साथ ही उन्होंने कहा कि जिन परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित जमीन का उपयोग नहीं हो सका है, वह जमीन संबंधित रैयतों को वापस की जानी चाहिए। ऐसा नहीं होना संवैधानिक मूल्यों और लोगों के अधिकारों का उल्लंघन है। झारखंड की अस्मिता और पारंपरिक व्यवस्था पर खतरा, सुबोध लकड़ा ने जताई चिंता जिला अध्यक्ष सुबोध कुमार लकड़ा ने कहा कि झारखंड की समतामूलक सामाजिक व्यवस्था और पारंपरिक पड़हा व्यवस्था को कमजोर करने की कथित कोशिशें बेहद चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल सामाजिक ढांचे पर हमला नहीं, बल्कि झारखंड की पहचान, संस्कृति और परंपराओं को प्रभावित करने वाला विषय है। उन्होंने कहा कि राज्य में लगातार बढ़ रही जातिगत रैलियां और धार्मिक जुलूस सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर रहे हैं। उनका कहना था कि इस तरह की गतिविधियां झारखंड की अस्मिता, अस्तित्व और पहचान के लिए खतरा बन सकती हैं। इसलिए सरकार को इस दिशा में गंभीरता से विचार करते हुए आवश्यक कदम उठाने चाहिए, ताकि राज्य की सामाजिक एकता, पारंपरिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह सके। झारखंड भवन में नि:शुल्क ठहराव से लेकर स्थानीय नीति तक, अमर भेंगरा ने उठाईं कई मांगें जिला सचिव अमर भेंगरा ने कहा कि झारखंड आंदोलनकारियों के लिए नई दिल्ली स्थित झारखंड भवन सहित राज्य और देश के सभी सर्किट हाउसों में नि:शुल्क ठहरने की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। उन्होंने मांग की कि राज्य के चौक-चौराहों का नामकरण तथा शिलालेखों पर पांचवीं अनुसूची की भावना के अनुरूप झारखंड आंदोलनकारियों के नाम को सम्मानपूर्वक स्थान दिया जाए। साथ ही राज्य और जिला स्तर पर झारखंड आंदोलनकारी कॉरिडोर का निर्माण भी सुनिश्चित किया जाए, ताकि आंदोलन के इतिहास और योगदान को संरक्षित किया जा सके। अमर भेंगरा ने सरकार से मांग की कि नगड़ी क्षेत्र में वर्षों से खेती कर रहे आदिवासी किसानों को विस्थापित करने और रिम्स-2 परियोजना के निर्माण से पहले उनकी आजीविका और अधिकारों को ध्यान में रखते हुए सहानुभूतिपूर्वक निर्णय लिया जाए। उन्होंने कहा कि गैर-मजरुआ भूमि पर वर्षों से काबिज लोगों की जमीन की रसीद दोबारा काटने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। इसके साथ ही राज्य में स्थानीय नीति का जल्द निर्धारण किया जाए। यदि इसमें और देरी होती है, तो अखंड बिहार के समय लागू स्थानीयता एवं नियोजन नीति को यथावत लागू किया जाए, ताकि राज्य के युवाओं और स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा हो सके। इस मौके पर सोबाना मुंडा, सनिका मुंडा,आशीष होरो सहित अन्य आंदोलनकारी उपस्थित थे. Post navigation मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से खत्म हुआ सुरक्षा विवाद, वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर को फिर मिली पूरी सुरक्षा