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बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों को लेकर महागठबंधन ने गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण, मतदान के आंकड़ों और पोस्टल बैलेट की गिनती में कथित गड़बड़ियों का आरोप लगाया है। महागठबंधन का कहना है कि कई विधानसभा सीटों पर जीत और हार के बीच बहुत कम मतों का अंतर रहा। ऐसे में मतदाता सूची से नाम हटाने और मतदान के आंकड़ों में बदलाव की भूमिका की जांच होनी चाहिए। हालांकि, इन आरोपों के समर्थन में अब तक कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं रखा गया है।

महागठबंधन के नेताओं ने उन विधानसभा सीटों को लेकर सवाल उठाए हैं, जहां जीतने वाले उम्मीदवारों को लगभग एक जैसी संख्या में वोट मिले। आरोपों के अनुसार, 20 सीटों पर विजेताओं के बीच मतों का अंतर शून्य से नौ वोटों तक बताया जा रहा है। इनमें 14 सीटों पर भाजपा, पांच पर जनता दल यूनाइटेड और एक सीट पर लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। विपक्ष का कहना है कि इतने कम अंतर से जीत दर्ज होने और अलग-अलग सीटों पर मतदान के आंकड़ों में समानता दिखाई देने के कारण संदेह पैदा हुआ है। हालांकि, केवल कम अंतर से चुनाव जीतना अपने आप में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है। राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने आरोप लगाया कि जिन सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी था, वहां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान असामान्य रूप से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए थे। उनके अनुसार, इससे मतदान का सामान्य रुझान प्रभावित हुआ और चुनाव परिणामों पर असर पड़ने की आशंका है। महागठबंधन ने कड़े मुकाबले वाली विधानसभा सीटों पर पोस्टल बैलेट की गिनती को लेकर भी सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि पोस्टल बैलेट के मतों को रद्द करने या उनमें बदलाव करने से कुछ सीटों पर जीत और हार का परिणाम प्रभावित हुआ। इस संबंध में बाराचट्टी और इमामगंज विधानसभा क्षेत्रों का उदाहरण दिया जा रहा है। विपक्षी नेताओं के अनुसार, इन सीटों पर विजेता और निकटतम प्रतिद्वंद्वी के बीच पोस्टल बैलेट के मतों का अंतर बहुत कम था। महागठबंधन का मानना है कि ऐसे मामलों की जांच की जानी चाहिए, ताकि मतगणना की प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब मिल सके।

बिहार विधानसभा चुनाव दो चरणों में संपन्न हुए थे। दूसरे चरण का मतदान समाप्त होने के बाद निर्वाचन आयोग ने कुल मतदान के आंकड़ों में 0.18 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा की थी। विपक्षी दलों ने इस वृद्धि को लेकर भी सवाल उठाए हैं। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता असितनाथ तिवारी ने इस आधार पर जुड़े 1,34,145 मतों को कथित तौर पर ‘फैंटम वोट’ यानी अस्तित्वहीन वोट बताया। उनका आरोप है कि इन मतों के कारण बेहद कम अंतर वाली विधानसभा सीटों के परिणाम प्रभावित हुए। हालांकि, मतदान के आंकड़ों में वृद्धि या बाद में जारी किए गए आंकड़ों में अंतर होने से अपने आप फर्जी मतदान साबित नहीं होता। इस मामले में वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए आधिकारिक आंकड़ों और संबंधित दस्तावेजों की जांच जरूरी है।

विपक्ष ने उन सीटों का भी उल्लेख किया है, जहां जीतने वाले और दूसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवारों के बीच महज 10 से 15 वोटों का अंतर बताया गया है। छतरपुर और तरारी – दिए गए आंकड़ों के अनुसार, मतों की संख्या क्रमशः 1,22,491 और 1,22,480 बताई गई है। इनके बीच 11 वोटों का अंतर है। अलीनगर और बक्सर – आंकड़ों में 84,915 और 84,901 मतों का उल्लेख है। अंतर 14 वोटों का बताया गया है। वैशाली और राजनगर – क्रमशः 1,08,377 और 1,08,362 मतों के आंकड़े दिए गए हैं। अंतर 15 वोटों का है। अलौली और नोखा – इन सीटों पर भी 15 वोटों के अंतर का दावा किया गया है। महागठबंधन का कहना है कि इन उदाहरणों के साथ उन 20 विधानसभा क्षेत्रों की भी जांच होनी चाहिए, जहां जीत का अंतर बेहद कम बताया जा रहा है। विपक्ष के अनुसार, ऐसी सीटों पर मतदाता सूची में बदलाव, मतदान के आंकड़ों और पोस्टल बैलेट की गिनती की भूमिका की निष्पक्ष समीक्षा जरूरी है।

राजद के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव भी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर पहले लगाए गए आरोपों को फिर सामने ला रहे हैं। बताया जा रहा है कि वे पुराने ऑडियो और वीडियो साझा कर निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। महागठबंधन का आरोप है कि SIR के दौरान मतदाता सूची में हुए बदलावों ने चुनावी मुकाबले को प्रभावित किया हो सकता है। विपक्ष का कहना है कि इस पूरे मामले में पारदर्शिता जरूरी है, ताकि मतदाताओं का भरोसा बना रहे। दूसरी ओर, उपलब्ध जानकारी में मतदान के आंकड़ों में कथित गड़बड़ी या पोस्टल बैलेट में जानबूझकर बदलाव किए जाने के आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए हैं। इसलिए इन दावों की पुष्टि आधिकारिक रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच के आधार पर ही की जा सकती है।

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