झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा दुमका प्रमंडल के तत्वावधान में बेलाटांड़ में झारखंड आंदोलनकारियों की बैठक और ‘अबुआ करम-अबुआ धरम, संस्कृति संरक्षण एवं संवर्धन’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में झारखंड आंदोलनकारियों और संस्कृति प्रेमियों ने झारखंड की भाषा, संस्कृति, पहचान, अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा का संकल्प लिया। इस दौरान करमा पर्व भी मनाया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि झारखंड की पहचान और यहां की संस्कृति को बचाने के लिए समाज को एकजुट होकर काम करने की जरूरत है। आंदोलनकारियों ने संथाल हूल और बिरसा उलगुलान के मूल्यों और आदर्शों की रक्षा पर भी जोर दिया। वक्ताओं ने कहा कि झारखंड आंदोलन जिन अधिकारों और सम्मान के लिए लड़ा गया था, उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है। बैठक में सरकार की नीतियों और आंदोलनकारियों की मांगों को लेकर भी नाराजगी जाहिर की गई। आंदोलनकारियों ने कहा कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन को झारखंड आंदोलनकारी के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित करने के लिए गजट नोटिफिकेशन सहित अन्य मांगों पर अब तक अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है। आंदोलनकारियों ने कहा कि उनकी मांगों और अधिकारों की अनदेखी के विरोध में आंदोलन को और तेज किया जाएगा। इसी क्रम में बैठक में 29 सितंबर को मशाल जुलूस और 30 सितंबर को संपूर्ण झारखंड बंद करने का निर्णय लिया गया। दुमका प्रमंडल के आंदोलनकारियों ने कहा कि वे अपने और अपने बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए बंद कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे। झारखंड की पहचान और आंदोलनकारियों के अधिकारों की रक्षा जरूरी – पुष्कर महतो कार्यक्रम के मुख्य अतिथि झारखंड आंदोलनकारी संघर्ष मोर्चा के संस्थापक प्रधान सचिव पुष्कर महतो ने कहा कि सिद्धू-कान्हू और झारखंड आंदोलनकारियों का तीर-धनुष सम्मान, न्याय, स्वाभिमान और पहचान की मांग का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि झारखंड आंदोलनकारियों ने अलग राज्य के लिए संघर्ष किया था, ताकि यहां के लोगों को उनके अधिकार मिल सकें और उनकी भाषा-संस्कृति और पहचान सुरक्षित रह सके। पुष्कर महतो ने आरोप लगाया कि आज झारखंड में आंदोलनकारियों के बच्चों के अधिकारों की अनदेखी हो रही है। उन्होंने कहा कि रोजगार और नौकरियों के मुद्दे पर भी युवाओं में चिंता है। उनके अनुसार, झारखंड के मूल्यों और अलग राज्य के आंदोलन की भावना को कमजोर करने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि झारखंड आंदोलनकारियों की जिम्मेदारी है कि वे अपने अधिकारों और झारखंड की पहचान की रक्षा के लिए एकजुट रहें। भाषा-संस्कृति ही आंदोलनकारियों की पहचान, रोजलीन तिर्की और जीदन कोल ने संघर्ष का लिया संकल्प कार्यकारी अध्यक्ष रोजलीन तिर्की ने कहा कि सरकार हूल के मूल्यों, अलग राज्य की विरासत, भाषा-संस्कृति और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने में विफल रही है। उन्होंने कहा कि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए समाज के सभी लोगों को एकजुट होकर प्रयास करना होगा। दुमका प्रमंडल के अध्यक्ष जीदन कोल ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि झारखंड की भाषा और संस्कृति ही आंदोलनकारियों की पहचान और स्वाभिमान है। उन्होंने कहा कि आंदोलनकारी अपने स्वाभिमान और पहचान के साथ किसी तरह का समझौता नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि जिस तरह पूर्वजों ने हूल किया था, उसी तरह अधिकारों की रक्षा के लिए फिर से एकजुट होकर संघर्ष किया जाएगा। कार्यक्रम के अंत में दिशोम गुरु शिबू सोरेन, उमानाथ कोल और जरीफ अंसारी को नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में दुमका प्रमंडल के सचिव बुधन कोल, मीनू टुडू, मालोती मरांडी, पौलुस हंसदा, रेणु मुर्मू, मो. इम्तियाज खां, हीरालाल कोल, नवीन कुमार सिंह, सेहरा बीबी, नसरुद्दीन मियां, गुलाम मुस्तफा, मेहरान बीबी, सलीम अंसारी, अनिल राणा, जमशेद अंसारी, हेमलाल मुर्मू, हेमलाल बेसरा, रघुनाथ सिंह, लखन किस्कू, भारदेंदु मुर्मू, रवि सोरेन, सिमोन मुर्मू, गुलाब कोल, अब्दुल मन्नान, बबलू कोल, मतनी देवी, तारा देवी, पिंकी देवी, सविता कुमारी, पूनम कुमारी, चंचल देवी, छूटू देवी, सोनिया हेंब्रम, ममता देवी, प्रतिमा देवी, झालिया देवी, मालती देवी, रेचु कुमारी, सुंदरी कुमारी और जमाल हुसैन समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे। Post navigation बंगाल की खाड़ी में डिप्रेशन से बदला झारखंड का मौसम, भारी बारिश और तेज हवाओं का अलर्ट